रविवार, 26 जून 2022

काव्य संकलन मणि की किरण का हुआ लोकार्पण

 मणि की किरण का लोकार्पण संपन्न

                   लाल बिहारी लाल      






 नई दिल्ली  ।  दिल्ली मेट्रों के डी सी पी जितेंद्र मणि द्वारा रचित पुस्तक ”, मणि की किरन,” जो कि एक काव्य संग्रह है और उनकी धर्मपत्नी स्वर्गीय किरण मणि त्रिपाठी को समर्पित है का अनावरण माननीय आयुक्त महोदय दिल्ली पुलिस श्री राकेश अस्थाना , श्री दीपक मिश्रा सेवानिवृत्त आईपीएस पूर्व एसडीजी सीआरपीएफ , श्री सुधांशु त्रिवेदी माननीय सांसद  ,श्री राम मोहन मिश्र  सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवम पूर्व सचिव भारत सरकार, श्रीमती नुज़्हत हसन विशेष आयुक्त दिल्ली पुलिस एवं श्री  अमरेंद्र खटुआ  आई एफ एस पूर्व सचिव भारत सरकार के कर कमलों द्वारा एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर मे संपन्न हुआ   ,इस कार्यक्रम में अन्य गणमान्य अतिथियों  में श्री वीरेन्द्र सिंह चहल  विशेष आयुक्त दिल्ली पुलिस, श्री दीपेंद्र पाठक विशेष आयुक्त पुलिस, श्री मधुप तिवारी  विशेष आयुक्त दिल्ली पुलिस, श्री संजय सिंह विशेष आयुक्त दिल्ली, श्री संजय शुक्ला  आइएफएस सचिव इंडियन जू सोसाइटी, डॉ आलोक मिश्रा  ज्वाइंट सेक्रेटरी अखिल भारतीय विश्विद्यालय संघ, csc सी एस सी  दिल्ली मेट्रो , श्री शुवशेष चौधरी, ए डी सी पी रजनीश गुप्ता, डी सी पी रेलवे  श्री हरेंद्र कुमार सिंह  डी सी पी आई जी आई  तनु शर्मा, ब्रदर सुनिल शर्मा श्री आलोक यादव ज्योति मिश्रा राका विक्रम के पोरवाल रजनीश गर्ग अन्येष राय  सतीश तिवारी विवेक कुमार मिश्रा, संतोष मिश्रा ,रूपा सिंह आदित्य मणि प्रवीण बंसल, राहुल बंसल, प्रेम नाथ द्विवेदी  प्रसिद्ध शायर आदिल राशीद ,आचार्य शैलेश तिवारी  श्री अरूण सिन्हा ज्वाइंट सेक्रेटरी भारत सरकार सहित कई गणमान्य अतिथियों ने भाग लिया, सभी मंच पर बैठे अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित करके कार्यक्रम की शुरुआत की एवम पुस्तक का विमोचन किया , पुस्तक की समीक्षा श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेई पूर्व एडीजी ऑल इंडिया रेडियो, श्रीमती अलका सिंह एवम नरेश शांडिल्य जी ने किया मंच संचालन  डॉ ज्योति ओझा  जी ने किया और पुस्तक का प्रकाशन  हिंदी सहोदरी की मुख्य संयोजक श्री  जय कान्त मिश्रा  जी ने किया । 

                इस अवसर पर  हास्य कवि श्री शंभू शिखर ने अपने काव्य पाठ से लोगो को गुदगुदाया सभी ने पुलिस विभाग ने होते हुए भी जितेंद्र मणि के संवेदनशीलता  ,अपनी पत्नी को विषय बना कर लिखी कविताओं  एवम काव्य प्रतिभा की भूरि भूरि प्रशंसा की ,पुलिस आयुक्त दिल्ली महोदय ने कहा कि पत्नी के असमय छोड़ की चले जाने की बाद जितेंद्र मणि की कार्य कुशलता में कोई कमी नही आई है और ये पूरी तत्परता और कार्य कुशलता से पुलिस सेवा कर रहें है। इस पुस्तक के आमदनी का कैंसर पीड़ितों पर खर्च किया जायेगा। यह पुस्तक फ्लिप कार्ट पर भी उपलब्ध है।

शुक्रवार, 17 जून 2022

रामनाथ पांडेय शिखर सम्मान से डॉ. मयंक मुरारी और डॉ.जौहर शफियाबादी हुए सम्मानित

 रामनाथ पांडेय शिखर सम्मान    

डॉ. मयंक मुरारी और डॉ.जौहर शफियाबादी सम्मानित

 लाल बिहारी लाल   





 नई दिल्ली l भोजपुरी के प्रथम उपन्यासकार रामनाथ पांडेय की पुण्यतिथि पर 16 जून को पटना में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें डॉ.मयंक मुरारी और डॉ.जौहर शफियाबादी को प्रथम रामनाथ पांडेय शिखर सम्मान प्रदान किया गया। दोनों विद्वानों को स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र और शॉल से सम्मानित किया गया।

सारण भोजपुरिया समाज और जागृत प्रकाशन के तत्वावधान में मैत्री शांति भवन, अशोक राजपथ पर आयोजित इस कार्यक्रम में रामनाथ पांडेय की कालजयी रचना "महेन्दर मिसिर" का लोकार्पण भी हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता चंद्रकेतु नारायण सिंह ने किया। अन्य मंचासीन अतिथियों में डॉ.सुनील पाठक, पूनम आनंद, तैय्यब हुसैन पीड़ित, भगवती प्रसाद द्विवेदी थे। लोकार्पण के बाद रामनाथ पांडेय जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर उपस्थित विद्वतजनों ने प्रकाश डाला। व्याख्यान के बाद काव्य पाठ का भी आयोजन हुआ। इसमें डॉ. मीना पांडेय, दिवाकर उपाध्याय, मधुरानी लाल, सुजीत सिंह सौरभ, श्याम श्रवण, सुधांशु कुमार सिंह ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। अन्य उपस्थित अतिथियों में भोजपुरी साहित्य जगत से जुड़ी कई हस्तियां  शामिल थीं,  जिनमें शुभ नारायण सिंह शुभ, राजेंद्र गुप्त, प्रेमलता, यशवंत मिश्रा, प्रणव पराग, रवि प्रकाश सूरज आदि प्रमुख थे। धन्यवाद ज्ञापन रामनाथ पांडेय के ज्येष्ठ सुपुत्र बिमलेंदु भूषण पांडेय ने किया तथा मंच संचालन दिवाकर उपाध्याय ने किया।

8 जून से चल रहा आयोजन

हर वर्ष की तरह इस बार भी कार्यक्रमों का सिलसिला रामनाथ पांडेय की जयंती 8 जून से प्रारंभ हुआ। 8 जून को चंपारण में 100 से ज्यादा कलाकारों का सम्मान किया गया। इसके साथ ही सारण भोजपुरिया समाज के पेज से हर दिन लाइव कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इसमें एक दर्जन से ज्यादा विद्वानों ने भोजपुरी साहित्य व रामनाथ पांडेय की कृतियों पर अपने विचार व्यक्त कि

शनिवार, 4 जून 2022

तंबाकू छोड़ो जीवन से नाता जोड़ो

 तंबाकू छोड़ो जीवन से नाता जोड़ो

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तंबाकू के इतिहास की बात करे तो सन 1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस ने  पहली बार  सैन साल्वाडोर द्वीप पर  तंबाकू की खोज की थी। और अपनी दूसरी यात्रा के दैरान  स्पेन में तंबाकू के पते लेकर आए। सन1558 में  तंबाकू के बीज पूरे यूरोप महाद्वीप में फैल गए और  उपनिवेशवादियों के  आक्रमण के साथ  धीरे –धीरे  यह सारी दुनिया में फैल गई ।
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लाल बिहारी लाल
 
 
सन 1988 से 31 मई को दुनिया भर में हर साल विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य तंबाकू सेवन के व्यापक प्रसार से नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभावों की ओर आम जन का ध्यान आकर्षित करना और इसके दुष्प्रभावो से जीवों को बचाना हैजो वर्तमान में दुनिया भर में हर साल 70 लाख से अधिक मौतों का कारण बनता हैजिनमें से 8,90,000 गैर-धूम्रपान करने वालों का परिणाम दूसरे नंबर पर हैं।  विश्व स्वास्थ्य  संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सदस्य देशों ने सबसे पहले  1987 में विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाने को सोंचा औऱ सनं 1988 से लगातार मनाते आ रहे है। पिछले  तीन दसक से  दुनिया भर में  इसके पक्ष औऱ विपक्ष दोनों तरफ के लोग खड़े मिले है। विश्व स्वास्थ्य  संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 7 अप्रैल 1988 को एक संकल्प पारित किया जिसके  तहत 24 घंटे दुनिया को तंबाकू पर रोक लगाने का आह्वाहन किया गया जिससे इसे छोड़ने वाले को प्रेरित किया जा सके इसी सोंच का परिणाम निकला कि 31 मई 1988 से हर साल विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाते आ रहे है।
      तंबाकू के इतिहास की बात करे तो सन 1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस ने  पहली बार  सैन सेल्वाडोर द्वीप पर  तंबाकू की खोज की थी। और अपनी दूसरी यात्रा के दैरान  स्पेन में तंबाकू के पते लेकर आए। सन1558 में  तंबाकू के बीज पूरे यूरोप महाद्वीप में फैल गए और  उपनिवेशवादियों के  आक्रमण के साथ  धीरे –धीरे  यह सारी दुनिया में फैल गई ।
     वर्ष 2003 में विश्व स्वास्थ्य  संगठन (डब्ल्यूएचओ) के पहल पर तंबाकू निषेध के लिए एक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य पर संधि हुआ। वर्ष 2008 में विश्व तंबाकू निषेध दिवस की पूर्व संध्या पर विश्व स्वास्थ्य  संगठन (डब्ल्यूएचओ) की और से एक आह्वाहन  सारी दुनिया को की गई की तंबाकू के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाई जाये। वही इसे हर साल एक श्लोगन भी दिया जाने लगा बात करे 2017 का तो इस बर्ष का श्लोगन था- विकास के लिए खतरा , 2018 का  तंबाकू दिल तोड़ता है।  इस साल( 2022) का श्लोगन है- पर्यावरण के लिए खतररनाक है तंबाकू
      तंबाकू के सेवन से श्वसन तंत्र, हृदय तंत्र, पाचन तंत्र, तंत्रिका तंत्र,  आदि के नुकसान होने के खतरे बढ़ जाते है। तंबाकू के सेवन से 30 प्रतिशत. कैंसर के मरीजों की संख्या है जिसमें लंग्स और मुँह के कैंसर मुख्य है। विश्व स्वास्थ्य  संगठन (डब्ल्यूएचओ के अनुसार हर साल 60 लाख लोग मरते है धूम्रपान  जनित रगो से यानी प्रति 6 सेकेंड में एक की मौत होती है। दुनिया में  उच्च रक्त चाप के बाद तंबाकू विश्व का दूसरा सबसे बड़ा  हत्यारा है। तंबाकु की खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति 35 लाख हेक्टेयर प्रति वर्य़ नष्ट हो जाते है जिसका असर सीधे पर्यावरण पर पड़ता है। तंबाकू उद्योग से हर साल 84 मीट्रिक टन कार्बन डाई आँक्साइड उत्सर्जित होते है जो वारतावरण को दूषित करते है।
 भारत में राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम  की शुरुआत वर्ष 2007-08 में  21 राज्यों के 42 जिलो में पायलेट परियोजना के रूप में किया गया। सर्वप्रथम राजस्थान के जिलों जयपुर व झुंझुनू को सम्मिलित कर गतिविधियाँ प्रारम्भ की गयी। वर्ष 2015-16 में जयपुरझुन्झुनू के अतिरिक्त अजमेरटॉकचूरूउदयपुरराजसमन्दचित्तौडगढकोटाझालावाडभरतपुरसवाईमाधोपुरअलवरजैसलमेरपालीसिरोहीश्रीगंगानगर जिले (कुल 17 जिले) योजनान्तर्गत सम्मिलित किये गये । आज देश के कोने कोने में इस पर काम हो रहा है। इसका परिणाम भी सकारात्मक मिल रहा रहा है।
    आज जरुरी है कि ध्रूम्रपान को न कहा जाये क्योकि इसके परिणाम से कितना जीव और घऱ बर्वाद हो चुके है। स्वास्थ्य एं पर्यावर दोनों जरुरी है  इसलिए भारत को आज तंबाकू मुक्त बनाने की जरुरत है।

लेखक- साहित्य टी.वी के संपादक है
 
 

उपन्यास रेत समाधि को मिला 2022 का बुकर सम्मान

 उपन्यासकार एवं कथाकार गितांजलि श्री को मिला 2022 का बुकर सम्मान

 
 लाल बिहारी लाल


 
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इस साल का मैन बुकर सम्मान भारतीय लेखिका गीतांजलि श्री का उपन्यास 'रेत समाधिके अंग्रेज़ी अनुवाद 'टॉम्ब ऑफ़ सैण्डके लिए दिया गया है जिसे डेजी राकवेल ने अंग्रैजी अनुवाद किया है। यह पहली बार है कि किसी भारतीय भाषा के अनुवाद को यह अवॉर्ड मिला है।
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नई दिल्ली। उपन्यासकार एवं कथाकार गितांजली श्री का जन्म 12 जून 1957 को उ. प्र. के मैनपुरी में हुआ था। इनके पिता अनिरुद्ध पांडेय सिविल सेवा में थेउनका स्थानांतरण हुआ तो जन्मस्थान उनसे छूट गया। अपनी मां 'श्री पांडेयके नाम को अपने नाम में जोड़ने वाली गीतांजलि श्री  उत्तर-प्रदेश के अलग-अलग शहरों में रही हैं।  लेखिका बताती हैं कि बचपन में अंग्रेज़ी किताबों के अभाव के कारण उनकी रुचि हिंदी की तरफ़ हुई और यहीं से शुरू हुई एक लेखिका की यात्रा। मुंशी प्रेमचंद की पोती से उनकी गहरी मित्रता ने भी इस यात्रा की ओर सहज मुड़ने में सहयोग दिया। दिल्ली आकर उन्होंने लेडी श्रीराम और जे.एन.यू.से आधुनिक भारतीय साहित्य की पढ़ाई की जबकि वह हिंदी साहित्य की तरफ़ झुकाव महसूस करती थीं। प्रेमचंद पर पीएचडी के लिए उन्होंने एक किताब तैयार की जिसे वह हिंदी में उनके प्रवेश की एक महत्वपूर्ण सीढ़ी मानती हैं। 
   उनकी पहली कहानी 'बेलपत्र' 1987 में देश के प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका हंस में छपी। 1991 में छपे कहानी-संग्रह 'अनुगूंजसे उन्होंने औपचारिक तौर पर हिंदी साहित्य में कदम रख दिया था।सन् 1994 में इनकी कहानी संग्रह अनुगुंज को यू.के. कथा सम्मान से सम्मानित किया गया।  उपन्यास 'माईसे उन्हें प्रसिद्धि मिलीइस किताब का अनुवाद सर्बियनकोरियन और उर्दू समेत कई भाषाओं में हुआ हैइसी किताब के अंग्रेज़ी अनुवाद को 'साहित्य अकादमीसम्मान 2000-01 में मिला। इसके अलावा श्री ने 'हमारा शहर उस बरसऔर 'ख़ाली जगहउपन्यास भी लिखे हैं जिनके अनुवाद फ़ेंच और जर्मन में हुए हैं। हाल ही में प्रकाशित 'रेत समाधि (2018) से चर्चा में है। इसी उपन्यास को  डेजी राकवेल ने टाँम्ब आँफ सैण्ड नाम से अंग्रैजी में अनुवाद किया है। जिसे वर्ष 2022 का मैन बुकर सम्मान दिया गया है। उपन्यास के अलावा उनके लिखे कई कथा-संग्रह भी हैं। इस उपलब्धि के लिए हमारी ओर से बहुत –बहुत बधाई।
 लेखक- साहित्य टी.वी. के संपादक है।