गुरुवार, 14 अगस्त 2014

जम्मू-काश्मीर और मीडिया लेखक लाल बिहारी लाल

जम्मू-काश्मीर और मीडिया
                   लाल बिहारी लाल
नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2014 को देश के प्रधान मंत्री के रुप में जब शपथ लिया था तो इसके कुछ दिनों बाद ही प्रधान मंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जीतेन्द्र सिंह  ने धारा 370  के पुर्नविचार का राग अलाप कर जम्मू काश्मीर के दुखती रग पर हाथ रख दिया । इन खबरो को देश एवं दुनिया के प्रिंट मीडिया के सभी छोटे-बडे समाचारपत्रो  एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रमुख टी.वी.चैनलों तथा इंटरनेट पर भी पूर-जोर तरीके से धारा 370 के गुण-धर्मों पर चर्चा किया और फिर आज पूर्व की भांति इतिहास के पन्नों में गुम हो गया। जम्मू-काश्मीर पर एक संक्षिप्त नजरिया डाल रहे है वरिष्ठ लेखक लाल बिहारी लाल ।

      अगर फिरदौस बर रुये जमी अस्त ।
      हमी अस्ती हमी अस्ती हमी अस्ती ।।

ये लाइनें शाहजहा द्वारा निर्मित दिल्ली के लाल किले के दीवाने खास में लिखी है जिसे काश्मीर के साथ जोड दिया जाता है। शाहजहां को जन्नत धरती पर उतार लाने की इच्छा थी और ता-उम्र  उसने पूरी लगन से इस पर काम भी किया । धरती पर नैसर्गिक रुप से जन्नत कही उतरी है तो वह जगह काश्मीर ही है। किन्तु  पिछले साठ-पैंसठ सालों में वहां पसरे आतंकवाद ने इस स्वर्ग सी-भूमी को जलते नर्क में बदल दिया है।
     काश्मीर /कश्मीर का प्राचीन नाम कश्यप मेरु या कश्यपपीर (कश्यप का झील) था। किंवदंती है कि महर्षि कश्यप  श्री नगर से तीन मील दूर हरि पर्वत पर रहते थे । जहां आजकल काश्मीर घाटी है।अति प्राचीन प्रागैतिहासिक काल में यहां एक बहुत बडी झील थी जिसके पानी को निकाल कर  महर्षि कश्यप  ने मनुष्यों(जीवों) के रहने लायक बनाया था। काश्मीर को भारत का स्विटजरलैड भी कहते हैं।
    काश्मीर 1587- से 1739 तक मुगल साम्राज्य के अधीन था। जहांगीर, शाहजहां काल के स्मारक आज भी निशांत बाग, शालिमार बाग आदि बिद्यमान है। काश्मीर पर 1739 से 1819 तक काबूल के राजाओं का अधिकार था। सन् 1819 में  पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने काबूल के अमीर दोस्त मुहम्मद  से  इसे छिन लिया और काश्मीर शीघ्र ही अंग्रेजो के हाथों में चला गया। सन् 1846 में  सिख अंग्रैजो से युद्ध हारे तो लाहौर की संधि के अनुसार  उन्हें हर्जाने के रुप में डेढ करोड रुपये देने थे। परन्तु लाहौर दरबार के पास इतना धन नहीं था इसलिए  लाहौर की संधि के तहत काश्मीर को 60 लाख रुपये नगद और सलाना 6 पसमीना साल अंग्रैजो को नजर करने के एवज में  जम्मू के राजा गुलाब सिंह को बेंच दिया गया।  डोगरों ने लद्दाख को पहले ही तिब्बत से जीत लिया था और इस काश्मीर को जम्मू में शामिल होने से वर्तमान जम्मू-काश्मीर रियासत स्वरुप में आयी। और इस वंश का 1947 तक वहां शासन रहा जम्मू और काश्मीर के बारे में आगे बढ़ने से पहले इसका आप से परिचय कराते चलें। मूल जम्मू और काश्मीर रियासत को भौगोलिक व सांस्कृतिक रूप से चार भागों में बांटा जा सकता है- बाल्टिस्तान, काश्मीर घाटी, लद्दाख और जम्मू। ये सभी क्षेत्र सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। बाल्टिस्तान-गिलगित व भारतीय कारगिल का क्षेत्र न सिर्फ शिया बाहुल्य है वरन् सामाजिक आधार पर भी ये घाटी के मुसलमानों से भिन्न है। काश्मीर घाटी सुन्नी बाहुल्य क्षेत्र है जो वर्तमान में उपद्रव का केन्‍द्र है। लद्दाख मूलतः तिब्बत का अंग है जहां बौद्ध धर्मानुयायी रहते हैं जबकि जम्मू हिन्दू बाहुल्य है। इस धार्मिक सांस्कृतिक विविधता वाले क्षेत्र को डोगरा शासकों ने बड़ी ही कुशलता से एक राजनैतिक सूत्र में पिरोये रखा।
   सन 1947 में 15 अगस्त को भारत स्वतंत्र हुआ तो अंग्रेजो के कुटनीतिकत चाल कि रियासतें  अपनी इच्छा अनुसार भारत या पाकिस्तान में विलय कर लें या चाहें तो स्वतंत्र रहें। परंतु तत्कालिन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के राजनीतिक  पहल पर 500 से अधिक रियासते भारत में विलय हो गई ।
    आजादी के समय जम्मू काश्मीर के तत्कालिन राजा हरि सिंह ने  जम्मू काश्मीर का अस्तित्व स्वतंत्र ही बरकरार रखना चाहा।और इसका बिलय नाहीं पाकिस्तान और नाहीं हिन्दुस्तान में किया । पाकिस्तान को उम्मीद थी कि जम्मू काश्मीर मुस्लिम बाहूल्य  रियासत होने के कारण इसका बिलय राजा हरि सिंह पाकिस्तान में करेगें पर ऐसा नहीं होता देख पाकिस्तान के तत्कालिन प्रधानमंत्री मो. जिन्ना ने कबाइलियों के सहयोग से जम्मू काश्मीर पर आक्रमण कर दिया। महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी  पर भारत बिना बिलय के मदद को तैयार नहीं हुआ । अतः जम्मू -काश्मीर को बिलय की सहमति के बाद भारत हरकत में आया और अक्टूबर 1947 में दोनों नव राष्ट्रों की सेनायें काश्मीर में आमने-सामने थीं। युद्ध को लंबा खींतचा देख यह मसला  संयुक्त राष्ट्र संघ में गया। और संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर सीज फायर का ऐलान हुआ। तब तक पाकिस्तान काफी हिस्सों पर कब्जा कर लिया था।
      जम्मू काश्मीर मसले को  मीडिया  में पूरजोर तरीके से उठाने का ही परिणाम है कि  सरकारी महकमा भी मीडिया के कारण काफी चुस्त दुरुस्त है और यहां तक कि वादी में सुधारात्मक प्रक्रिया के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ के सोंच में परिवर्तन आया है  और  संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा समिति  जम्मू काश्मीर को अनसुलझे बिवादित मुद्दों की सूची से  2010 में बाहर कर दिया। यह भारत की कूटनीतिक  सफलता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सैन्य पर्यवेक्षक कार्यालय ने दिल्ली में अपना दफ्तर भी बंद कर लिया है और शीघ्र ही श्रीनगर में भी अपना दफ्तर बंद करने वाली है।
    अगर इसी तरह मीडिया अपनी सकारात्मक भुमिका निभाती रही तो वह दिन दूर नहीं जब जम्मू कास्मीर से आतंकवाद का खात्मा होगा होगा और वहां के लोग सामान्य जीवन बसर कर सकेंगे और काश्मीर धरती के स्वर्ग को पुनः सकार कर सकेगी। इसके लिए मीडिया बधाई के पात्र है। 
   ****सचिव लाल कला मंच,
        बदरपुर,नई दिल्ली -110044

        फोन-9868163073

सोमवार, 19 मई 2014

अबकी बार मोदी सरकार का जुमला काफी सफल रहा-लाल बिहारी लाल

 अबकी बार मोदी सरकार का जुमला काफी सफल रहा-लाल बिहारी लाल
नई दिल्ली। 2009 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को 198 सीटे जबकि भाजपा को 112 सीटें मिली थीं। परन्तु इस बार 2014 के लोक सभा चुनाव में परिस्थितिय़ां बिल्कुल उलटी है । भाजपा आगे है और कांग्रेस पीछे अर्थात कांग्रेस+(यू.पी.ए.) को 61 सीटें जबकि भाजपा+(एन.डी.ए.) को 335 सीटे मिली।इस तरह भाजपा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। इस चुनाव में भाजपा की और से अच्छी मिडीया प्रबंधन,भाजपा के बजाये मोदी का ब्यक्तित्व,गुजरात माँडल की पैमाइस, आन्तरिक कलह को डब्बें में बंद करना,मुस्लिम वोटो का बिभिन्न पार्टियों को जाना कांग्रेस के लिए भारी परा पर भाजपा के लिए काफी कारगर सिद्ध हुआ। महंगाई में वर्तमान सरकार की विफलता एवं बेरोजगारी से त्रस्त जनता के कारण इस सरकार से लोगो के बीच में काफी असंतोष फैल गया था जिससे एंटी कंम्बैंसिंग फैक्टर काफी काम किया और उपर से  मोदी का नारा कि अच्चे दिन आनेवाले है और अबकी बार मोदी सरकार का जुमला काफी सफल साबित हुआ।

    आनेवाले दिनों में अब देखना है कि मोदी इन दो जुमलों पर कितने खडे उतरते हैं। अगर सही तरीके से काम करते हैं तो  और खडे उतरते हैं तो जनता उन्हे सर आंखो पर बिठायेगी वरना रेत के भीत की तरह पल में ही जमी दोज कर देगी। फिर इस देश का रखलाला कौन होगा कहना बडा मुस्किल होगा। इसलिए एक आश बंधी है  कि च्छे दिन आने वाले हैं।
प्रस्तुति-सोनू गुप्ता
अध्यक्ष-लाल काला मंच,नई दिल्ली


मंगलवार, 6 मई 2014

गोविन्दम ने दिया विधवाओं को सिलाई मशीन

चौ.फूल सिंह की स्मृति में सिलाई वितरण

गोविन्दम ने दिया विधवाओं को सिलाई मशीन


नई दिल्ली । विगत कई वर्षों से समाजिक कार्यो में सक्रिय भुमिका निभानेवाले गोविन्द सेवा ट्रस्ट के संस्थापक अध्यक्ष एवं समाजसेवी गोविन्द राम आवाना ने अपने ताऊ एवं समाजसेवी स्व. चौ.फूल सिंह के 79 वें पुण्य तिथि पर 5 मई को उनके स्मृति में गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी-फुलवति,शकुंतला,भूदेवी,अंजू,उर्मिला देवी,रमा देवी सहित बदरपुर विधान सभा क्षेत्र के 31 गरीब,अक्षम विधवाओं को सिलाई मशीन का वितरण एक भव्य समारोह में गोविन्द बेंकट हाल,स्कूल रोड में गोविन्द राम अवाना,जीतेन्द्र वशिष्ठ,प्रसन्न आवान,खुशीराम  आवान,गीता आवाना,विरम,खेमराज ,एस.पी. सिंह आदि द्वारा किया गया। ताकि वे अपने कौशल के बल पर जीविकोपार्जन कर सके।

     इस समारोह के मुख्य अतिथि चौ. संजय भाई जोशी(भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय संगठन मंत्री) एवं महामंडलेश्वर श्री नवल किशोर दास जी थे। अतिथियों ने कहा कि आज भौतिकतावादी समाज में गोविन्द राम आवान का प्रयास काफी सराहनीय है जो समाज में काफी बढचढ कर हिस्सा लेते है और समय-समय पर निर्धन एवं गरीब तबकों का आर्थिक सबलता प्रदान करते रहते है तो कभी गरीब कन्याओं का विवाह करवातें है। सानिध्य-दक्षिणी दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष –बलराम बिंदल एवं उपाध्यक्ष-रवि लोहिया का था। मंच संचालन गोविन्द राम आवाना ने किया । इस कार्यक्रम को सफल बनाने में पिछले कई महिनों से जीतेन्द्र वशीष्ठ, रिंकू शर्मा एवं प्रदीप आवाना सहित समस्त गोविन्दम परिवार लगा हुआ था।
प्रस्तुति- लाल बिहारी लाल स
सचिव-लाल कला मंच,फोन-09868163073



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सोमवार, 5 मई 2014

अंबेडकर/परशुराम जयंति पर लाल बिहारी लाल की गतिविधियां


 दिनांक 27/4/1914 के संजय कालोनी ,फरीदाबाद(हरियाणा) में 123 वें बाबा भीम राव अंबेडकर जयंती के आयोजन पर अधुनिक भारत के जनक बाबा भीम राव अंबंडकर को पुष्पांजलि करते हुए समाजसेवी एवं लाल कला मंच के सचिव लाल बिहारी लाल साथ में दिवाकर मिश्रा एवं संजय मिश्रा/2. लाल बिहारी लाल का स्वागत करते हुए संस्था के पदाधिकारी।

भगवान परशुराम जयंती के अवसर पर मीठापुर में भगवान परशुराम के गुणों को आत्मसात करते हुए बीच में लाल कला मंच के सचिव एवं लेखक लाल बिहारी लाल साथ में संजय मिश्रा एवं के.सी. गौतम। 
फोटो-मनोज सिंह

शुक्रवार, 2 मई 2014

क्रोधी पर लोक कल्याणकारी थे भगवान परशुराम –लाल बिहारी लाल

भगवान परशुराम जयंती पर विशेष

क्रोधी पर लोक कल्याणकारी थे भगवान परशुराम –लाल बिहारी लाल

नई दिल्ली। भगवान परशुराम को उनके हठी स्वभाव, क्रोध और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए याद किया जाता है। भगवान परशुराम एक उदाहरण हैं कि क्रोध इंसान को बर्बाद कर सकती है, लेकिन अगर हम अपने क्रोध और अन्य इंद्रियों पर काबू पा लें तो हम भी उतम लोगों की श्रेणी में आ सकते हैं।  भगवान परशुराम विष्णु के छठें अवतार हैं जो वामन एवं रामचंद्र के बीच का काल है। भगवान परशुराम बैशाख शुक्ल पक्ष अक्षय तृतीया के पुण्य दिवस पर ही अवतरित हुए। इस दिन उनके कर्मों  का स्मरण और अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता की सोपान चढ सकता है। 
भगवान परशुराम क्रोधी होने के साथ साथ अत्यंत समझदार, कल्याणकारी और धर्मरक्षक भी थे। इस विषय में एक घटना बेहद लोकप्रिय है: भगवान परशुराम के पिता भृगुवंशी ऋषि जमदग्नि और माता राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका थीं। ऋषि जमदग्नि बहुत तपस्वी और ओजस्वी थे। ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्ववानस और राम (परशुराम) हुए। एक बार रेणुका स्नान के लिए नदी किनारे गईं। संयोग से वहीं पर राजा चित्ररथ भी स्नान करने आया था, राजा चित्ररथ सुंदर और आकर्षक था। राजा को देखकर रेणुका भी राजा के प्रति आसक्त हो गईं किन्तु ऋषि जमदग्नि ने अपने योगबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया। उन्होंने आवेशित होकर अपने पुत्रों को अपनी मां का सिर काटने का आदेश दिया। किन्तु परशुराम जो पितृभक्त थे,को छोड़कर सभी पुत्रों ने मां के स्नेह के कारण वध करने से इंकार कर दिया, लेकिन परशुराम ने पिता के आदेश पर अपनी मां का सिर काटकर धर से अलग कर दिया।
   क्रोधित ऋषि जमदग्नि ने आज्ञा का पालन न करने पर परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों को चेतनाशून्य हो जाने का श्राप दे दिया। वहीं परशुराम को खुश होकर वर मांगने को कहा। तब परशुराम ने पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ वर मांगा। जिसमें उन्होंने तीन वरदान मांगे पहला- अपनी माता को फिर से जीवन देने और माता को मृत्यु की पूरी घटना याद न रहने का वर मांगा। दूसरा- अपने चारों चेतनाशून्य भाइयों की चेतना फिर से लौटाने का वरदान मांगा और तीसरा वरदान स्वयं के लिए मांगा जिसके अनुसार उनकी किसी भी शत्रु से या किसी भी युद्ध में पराजय न हो और उनको लंबी आयु प्राप्त हो। इस तरह अपनी बुद्धिमता से परशुराम ने अपनी माता को भी जीवित कर लिया, पिता की आज्ञा का पालन भी किया और अपने भाइयों का भी साथ दिया।
    इस घटना के कुछ समय बाद ही एक दिन जमदग्नि ऋषि के आश्रम में कार्त्तवीर्य अर्जुन आए। जमदग्नि मुनि ने कामधेनु गौ की सहायता से कार्त्तवीर्य अर्जुन का बहुत आदर सत्कार किया। कामधेनु गौ की विशेषताएं देखकर कार्त्तवीर्य अर्जुन ने जमदग्नि से कामधेनु गौ की मांग की किन्तु जमदग्नि ने उन्हें कामधेनु गौ को देना स्वीकार नहीं किया। इस पर कार्त्तवीर्य अर्जुन ने क्रोध में आकर जमदग्नि ऋषि का वध कर दिया और कामधेनु गौ को अपने साथ ले जाने लगा किन्तु कामधेनु गौ तत्काल कार्त्तवीर्य अर्जुन के हाथ से छूट कर स्वर्ग चली गई और कार्त्तवीर्य अर्जुन को बिना कामधेनु गौ के वापस लौटना पड़ा। यह घटना जब हुई उस समय परशुराम वहां मौजूद नहीं थे। जब परशुराम वहां आए तो उनकी माता छाती पीट-पीट कर विलाप कर रही थीं।  अपने पिता के आश्रम की दुर्दशा  एवं शव पर 21 घाव देखकर और अपनी माता के दुःख भरे विलाप सुन कर परशुराम जी ने इस पृथ्वी पर से क्षत्रियों को 21 बार संहार करने की शपथ ले ली। पिता का अन्तिम संस्कार करने के पश्‍चात परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन से युद्ध करके उसका वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया । इस पर महर्षि बालिमिकी का कहना है कि उन्होने श्रत्रविमर्दन न करते हुए बल्कि राजविर्मदन किया। और उनके रक्‍त से समन्तपंचक क्षेत्र में पांच सरोवर भर दिए। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया। उन्होंने  21 बार इस पृथ्वी का परिक्रमण किया जिसमें 108 शक्तिपीठ एवं तीर्थों की स्थापना की।

राम से परशुराम-परशुराम के बचपन का नाम राम था, उनके नाम के साथ भी एक पौराणिक कहानी जुड़ी हुई है जो कुछ इस प्रकार से है- एक दिन गणेश भगवान पृथ्वी  पर भ्रमण कर रहे थे और किसी बात पर उनका राम से साथ झगड़ा हो गया। राम ने गणेश को धरती पर पटक दिया जिससे गणेश का एक दांत टूट गया और राम ने गणेश से उनका प्रिय अस्त्र परशुछीन लिया। जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो उन्होंने राम को परशुरामका नाम दे दिया।भगवान परशुराम जी शास्त्र एवम् शस्त्र विद्या के पूर्ण ज्ञाता हैं। प्राणी मात्र का हित ही उनका सर्वोपरि लक्ष्य होता है। भगवान शिव, परशुराम जी के गुरू हैं। वह तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरूष हैं। न्याय के पक्षधर होने के कारण भगवान परशुराम जी बाल अवस्था से ही अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे। उन्होंने दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की निरंतर सहायता एवम् रक्षा की है इसलिए लोग इन्हें कल्याणकारी भगवान के रुप में भी जाना जाता है।
लेखक-लाल कला मंच के सचिव है.।
फोन-9868163073
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मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

मां समान पृथ्वी का रखें ख्याल-लाल बिहारी लाल

22 अप्रैल पृथ्वी दिवस पर विशेष 
मां समान पृथ्वी का रखें ख्याल-लाल बिहारी लाल


सबसे पहले विश्व में सितम्बर 1969 में सिएटलवाशिंगटन में एक सम्मलेन में विस्कोंसिन के अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन घोषणा की कि 1970 की वसंत में पर्यावरण पर एक राष्ट्रव्यापी जन साधारण प्रदर्शन किया जायेगा। सीनेटर नेल्सन ने पर्यावरण को एक राष्ट्रीय एजेंडा में जोड़ने के लिए पहले राष्ट्रव्यापी पर्यावरण विरोध की प्रस्तावना दी."यह एक जुआ था," वे याद करते हैं "लेकिन इसने अपना काम किया."
जानेमाने फिल्म और टेलिविज़न अभिनेता एड्डी अलबर्ट ने पृथ्वी दिवस, के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। हालांकि पर्यावरण सक्रियता का सन्दर्भ में जारी इस वार्षिक घटना के निर्माण के लिए अलबर्ट ने प्राथमिक और महत्वपूर्ण कार्य किये, जिसे उसने अपने सम्पूर्ण कार्यकाल के दौरान प्रबल समर्थन दिया, लेकिन विशेष रूप से 1970 के बाद पृथ्वी दिवस को अलबर्ट के जन्मदिन22 अप्रैल, को मनाया जाने लगा। उनके इस प्रयास ने तत्कालीन सांस्कृतिक और पर्यावरण चेतना पर बहुमूल्य प्रभाव डाला।
         22 अप्रैल , 1970, पृथ्वी दिवस आधुनिक पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत की. के बारे में 20 लाख अमेरिकियों , एक स्वस्थ है ,  स्थायी  हिस्सा लेने के उद्देश्य से पर्यावरण. हेस और अपने पुराने कर्मचारियों को भारी तट से तट रैलियों का आयोजन किया. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के हजारों  पर्यावरण के प्रदूषण  के खिलाफ संगठित विरोध की. उस समूह  तेल रिसाव की , प्रदूषण, कारखानों और  बिजली संयंत्रों , कच्चे  मलजल , विषाक्त हार के कगार पर ,  जो कीटनाशकों ,  जिस तरह से खुला ,  जंगल को नुकसान , और  वन्यजीव   उन्मूलन  लड़ाई की, वह था  अचानक एहसास हुआ कि वे आम मूल्यों साझा कर रहे हैं . कर रहे हैं सेन नेल्सन पर पृथ्वी दिवस कहा  लोग  . "काम" के स्तर पर सहज प्रतिक्रिया का , 1970, महत्वपूर्ण कानूनों की एक संख्या के साथ पृथ्वी दिवस, कांग्रेस द्वारा पारित किए गए . सहित: -  स्वच्छ वायु अधिनियम , जंगली भूमि और  महासागर , और  संयुक्त राज्य अमेरिका पर्यावरण संरक्षण एजेंसी  के सृजन. 175 दुनिया के देशों, यह मनाया जाता है , और गैर लाभ  पृथ्वी दिवस नेटवर्क  द्वारा समन्वित है. जो पृथ्वी दिवस "दुनिया का सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्ष छुट्टी के अनुसार , अधिक एक अरब आधे से एक वर्ष से मनाया जाता है जो ".
     सन 1990 में 200 मिलियन लोगों का 141 देशों में आगमन और विश्व स्तर पर पर्यावरण के मुद्दों को उठा कर, पृथ्वी दिवस ने  22 अप्रैल को पूरी दुनिया में पुनः चक्रीकरण के प्रयासों को उत्साहित किया और रियो डी जेनेरियो में 1992 के संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मलेन के लिए मार्ग बनाया।
   2000 में, इंटरनेट ने पूरी दुनिया के कार्यकर्ताओं को जोड़ने में पृथ्वी दिवस की मदद किया । 22 अप्रैल के आते ही, पूरी दुनिया के 5000 समूह एकजुट हो गए, और 184 देशों के सैंकडों मिलयन लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। 2007 का पृथ्वी दिवस अब तक के सबसे बड़े पृथ्वी दिवसों में से एक था, जिसमें अनुमानतः हजारों स्थानों जैसे कीव, युक्रेन; काराकास, वेनेजुएला; तुवालु; मनीला, फिलिपींस; टोगो; मैड्रिड, स्पेन, लन्दन; और न्यूयार्क के करोड़ों लोगों ने हिस्सा लिया
.

ग्लेशियरों के पिघल जाने पर आने वाले कुछ दशकों में पृथ्वी के अस्तित्व के समक्ष खतरा पैदा होने जैसी बातों को महज अटकलबाजीकरार देते हुए भारत के शीर्ष हिम वैज्ञानिक रैना ने कहा है कि हिमालय के जिन ग्लेशियरों के पिघलने की बात उठ रही है, उनमें से महज दो से तीन हजार को ही भूमंडलीय तापमान में वृद्धि के चलते खतरा हो सकता है।आईपीसीसी की चौथी आकलन रिपोर्ट में हिमालयी ग्लेशियरों के 2035 तक पूरी तरह पिघलने के अनुमान को गलत साबित करती पर्यावरण और वन मंत्रालय की रिपोर्ट को पिछले वर्ष तैयार चुके भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण के पूर्व उप निदेशक रैना ने कहा कि यह कहना सरासर गलत है कि आने वाले दशकों में सारे ग्लेशियरों के पिघल जाने के बाद पृथ्वी ही खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा कि पृथ्वी 4.5 सौ करोड़ वर्ष पुरानी है और चंद दशकों में उसके अस्तित्व को खतरा नहीं हो सकता। हालाँकि, तापमान को ग्लेशियर ही प्रभावित करते हैं और कार्बन उत्सर्जन की बेहद गंभीर समस्या के चलते उन्हें नुकसान भी पहुँच रहा है। रैना ने कहा कि हिमालय के भारतीय क्षेत्र में करीब 9,575 ग्लेशियर हैं। इनमें अगर खतरा होगा तो सिर्फ दो से तीन हजार ग्लेशियरों को होगा। गौरतलब है कि आईपीसीसी की रिपोर्ट के दावे के प्रत्युत्तर के रूप में आई पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया था कि हिमालय ग्लेशियर पिघल रहे हैं लेकिन उनके पिघलने की रफ्तार ऐसी नहीं है कि 2035 तक वे पूरी तरह विलुप्त होकर पृथ्वी के अस्तित्व के समक्ष खतरा
पैदा कर देंगे।
      ग्रीन हाउस गैस  के प्रभाव को कम करने के लिए दिसंबर 1997 में क्योटो पोटोकाँल लाया गया । जिसमें विश्व के 160 देशों ने यह स्वीकार किया कि ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में कमी लाई जायेगी परन्तु भारत,चीन सहित कुछ देशों ने ही पहल किया जबकि कूल ग्रीन हाउस गैस का 80 प्रतिशत से ज्यादा उत्सर्जक अमेरिका आज भी इससे बचते आ रहा है।
 ग्रीन हाउस गैस पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले गैर.सरकारी संगठन टॉक्सिक लिंक्सके रवि अग्रवाल कहते हैं, 'अगर हमें पृथ्वी को बचाना है तो हमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती पर ध्यान केंद्रित करना होगा।'  विकसित देशों को व्यापक कार्बन कटौती के लिये राजी नहीं किया गया तो पृथ्वी का अस्तित्व खतरे में होगा। अग्रवाल ने कहा कि पृथ्वी को बचाना है तो सरकारों को उद्योग जगत को साथ लेकर चलना होगा क्योंकि उन्हीं के चलते कार्बन उत्सर्जन और अन्य तरह के प्रदूषण में इजाफा हुआ है।

उन्होंने कहा कि खासतौर पर भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिये कार्य योजना जरूर तैयार की है लेकिन इस योजना को सही मायनों में लागू करना चुनौतीपूर्ण होगा।
  
पृथ्वी की रक्षा करने के कुछ सरल उपाय-
1.   बाजार जाते समय घर से कपडे,जूट का थैला या बास्केट लेते जायें।
2.   प्लास्टिक के उपयोग किये हुए थैले को पुनः उपयोग करे ।
3.   अलग-अलग समान के बजाये एक ही प्लासटिक थैली में अनेक समान एक साथ रखें .
4.   घर पर कम से कम प्लास्टिक थैले का उपयोग करें।
5.   पर्यावरण के प्रति स्वंय जागरुक रहे और औरों को भी जागरुक बनायें।
6.   बच्चों को प्रोत्साहित करें पर्यावरण के प्रति और प्लास्टिक से हेने वाले नुकसान को समझायें। 
7.   ताकि कल वो इसे समझ सकें।
8.   पानी की बर्बादी रोके।
9.   बच्चों के पुराने खिलौने कबाडी को न बेंचे बल्कि अपने से छोटे बच्चों को गिफ्ट में दे दें।
1. इसके अलावें कई ऐसे प्रयास है जिसके तहत पृथ्वी को होनेवाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

लेखक –लाल बिहारी लाल, 
पर्यावरण प्रेमी ,सचिव-लाल कला मंच,नई दिल्ली

पीएच. 09868163073

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

उदयोग भवन के करीब पार्क में फूलों एवं मौसम का आनंद लेते हुए -लाल बिहारी लालएवं राज कुमार उग्रवाल

समाजसेवी एवं लेखक लाल बिहारी लाल संग में हैं दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समाचार पत्र हमारा मैट्रो के मुख्य संपादक राजकुमार अग्रवाल उदयोग भवन के करीब पार्क में फूलों एवं मौसम का आनंद लेते हुए।